दीपावली का पर्व कैसे मनाएं?

दीपावली का पर्व कैसे मनाए? आज के समय में यह सबसे बड़ा पश्न है। बदलते मौसम के कारण दीपावली के पर्व के दौरान प्रदुषण की समस्या बढ़ जाती है और इस गंभीर प्रदूषण की समस्या का प्रभाव दीपावली के पर्व पर पड़ता है। जिससे दीपावली के पर्व को बदनाम करने और तमाम तरह के प्रतिबंध लगाने की साजिश होती है।

दीपावली सनातन हिन्दू धर्म का एक प्रमुख पर्व है। यह धन, वैभव, सुख, समृद्धि और खुशी का पर्व है। दीपावली के पर्व को मनाने के लिए घरो की सफाई करके इस दिन सायंकाल शुभ मुहूर्त में धन की देवी माता लक्ष्मी और विघ्न विनाशक एवं बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश का पूजन किया जाता है और मिट्टी के दीये के बहुत से दीपक गाय के घी और सरसों के तेल से जलाया जाता है तथा इस दीपक से पुरे घर को सजाया जाता है और रोशन किया जाता है तथा मिठाई का प्रसाद पुरे घर में बांटा जाता है और खाया जाता है तथा दीपक जलने के दौरान बारूद के पटाखे जलाकर फोड़े जाते हैं। यह परंपरा आदि काल से ही चली आ रही है। बारुद के पटाखे जब तक दीपक जलता है तभी तक फोड़े जाने की परंपरा रही है। 
दीपावली का पर्व बरसात के मौसम के गर्मी से जाड़े के तरफ जाने वाले मौसम परिवर्तन के दौरान पड़ता है। बरसात के मौसम में बहुत से किटाणु और विषाणु पैदा हो जाते है, जिससे बिमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है। इस दौरान दीपावली के पर्व के आगमन पर घरो की सफाई करके गाय के घी और सरसों के तेल से मिट्टी के दीये के कई दीपक जलाने और दीपक जलने के दौरान ही बारूद के पटाखे फोड़ने से किटाणु और विषाणु नष्ट हो जाते हैं तथा वायुमंडल और मौसम साफ एवं शुद्ध हो जाता है, जिससे बिमारियों का प्रकोप खत्म हो जाता है। 

लेकिन आधुनिकता के दौर में यह परंपरा कुछ विकृत हो गई है अब मिट्टी के दीये के दीपक का स्थान मोमबत्ती और बिजली के छोटे बल्बों के छालर ने ले लिया है तथा पटाखे पूरी रात फोड़े जा रहे है, जिससे वायुमंडल और मौसम प्रदुषित हो जाता है, और बिमारियों का प्रकोप बढ़ने लगता है। इसलिए दीपावली का पर्व परंपरागत तरीके से ही मनाएं और कम से कम एक घाय के घी तथा 25 सरसों के तेल से मिट्टी के दीये का दीपक अवश्य जलाएं तथा बारूद के पटाखे जब तक दीपक जले तभी तक फोड़े। इससे प्रदूषण नियंत्रित रहेगा तथा वायुमंडल और मौसम साफ और शुद्ध रहेगा। 

   ___राजेश मिश्रा_

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