न्यायालय द्वारा स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के नाम पर समाजिक तथा नैतिक मूल्यों और मर्यादा की बलि देना उचित नही है

न्यायालयों में जिस तरह स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के नाम पर समाजिक तथा नैतिक मूल्यों और मर्यादा की बलि चढ़ाई जा रही है उससे भारतीय समाज विकृत होता चला जा रहा है। स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार के नाम पर भारतीय समाज में अश्लीलता की पराकाष्ठा बढ़ती चली जा रही है, मानवीय सम्बन्धों का स्वरूप विकृत हो रहा है तथा परिवारिक संरचना नष्ट होता चला जा रहा है। 

भारतीय समाज में जिस तरह स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार के नाम पर "लिव इन रिलेशन" और समलैंगिकता पर बात हो रही है वह समाजिक तथा नैतिक मूल्यों और मर्यादा के दायरे में नही है।

भारतीय समाज भारत की संस्कृति, संस्कार तथा मानवीय, नैतिक और अध्यात्मिक मुल्यों से बना है। भारतीय समाज में परिवार के अवधारणा की नीव सम्बन्धों में आपसी विश्वास, मानवता, नैतिकता और मर्यादा है।

स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार के नाम पर "लिव इन रिलेशन" अर्थात पुरूष और स्त्री का बिना शादी किये पति-पत्नी की तरह एक साथ रहना, इसे न्यायालय द्वारा कानूनी रुप देकर भारतीय समाज में अपरोक्ष रूप से अश्लीलता को परोसा जा रहा है और इसका पोषण किया जा रहा है। "लिव इन रिलेशन" से सम्बन्धों का स्वरूप विकृत हो रहा है और परिवार की अवधारणा नष्ट हो रही है। जिससे भारतीय समाज का स्वरूप विकृत हो रहा है। 

स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार के नाम पर समलैंगिकों को कानूनी रूप से आपस में शादी का अधिकार और बच्चा गोद लेने का अधिकार देने की बात हो रही है। समलैंगिकता एक मानसिक विकलांगता है और यह किसी-किसी पुरुष और स्त्री में प्राकृतिक रूप से होता है। यह समाज में हमेशा से रहा है, लेकिन इस पर पहले कभी बहस नही हुई है और यह कभी मुद्दा नही बना है। समाज में यह हमेशा स्वीकार्य रहे है और समाज कभी इनसे प्रभावित नही हुआ है। लेकिन समलैंगिकों को आपस में शादी करने और बच्चा गोंद लेने का कानूनी अधिकार देने से समाज में अप्राकृतिक समलैंगिक सम्बन्धों को बढ़ावा मिलेगा तथा इनके द्वारा गोंद लिया गया बच्चा हीनता की भावना का शिकार हो सकता है और उसके अंदर विकृति आ सकती है। 

   ___राजेश मिश्रा_

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