उतर प्रदेश में ब्राह्मण विधायकों के सहभोज बैठक से कुछ लोगों को पीड़ा क्यों?
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उतर प्रदेश में ब्राह्मण विधायकों के सहभोज बैठक से कुछ लोगों को पीड़ा क्यों?
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ब्राह्मणों की एकता से कुछ लोगों को डर क्यो लगता है और कुछ लोग क्यों नही चाहते हैं कि ब्राह्मणों में एकता हों?
उत्तर प्रदेश में 17% ब्राह्मण वोटर है और ये सैकड़ों विधानसभा और लोकसभा की सीटों को प्रभावित करने की क्षमता रखते है और सरकार बनाने और बिगाड़ने में निर्णायक भूमिका रखते है। लेकिन आपस में एक न होने के कारण इनको महत्व नही मिलता है।
23 दिसंबर 2025 को लखनऊ में कुशीनगर के भारतीय जनता पार्टी के ब्राह्मण विधायक पंचानंद (पीएन) पाठक के सरकारी आवास पर ब्राह्मण विधायकों का सहभोज बैठक हुआ था। इसमें लगभग 50 ब्रह्मणा विधायक शामिल थे। इस बैठक के बाद सियासी तुफान खड़ा हो गया है और भारतीय जनता पार्टी और इसके सहयोगी दल के कई नेता ब्राह्मण विधायकों के सहभोज बैठक के विरोध में मुखर हो गये है।
अभी कुछ दिनों पहले ही क्षत्रिय विधायकों की भी एक बैठक हुई थी, जिसमें लगभग 40 क्षत्रिय विधायक शामिल हुए थे और ज्यादातर क्षत्रिय विधायक भारतीय जनता पार्टी के थे। लेकिन उस समय इस पर कोई सियासी तुफान नही खड़ा हुआ और भारतीय जनता पार्टी और इसके सहयोगी दल के किसी भी नेता ने इसके विरोध में किसी ने कुछ नही बोला।
सभी पार्टियों के सभी जातियों के नेता अपनी जातियों की बैठक और सम्मेलन करते है तो किसी को कोई समस्या नही होती है तो ब्राह्मणों के ऐसा करने पर समस्या क्यों हो रही है? ब्राह्मणों को यह समझना चाहिए कि कुछ नेता ब्राह्मण एकता से क्यों घबड़ा रहे हैं? कुछ नेता क्यों चाहते है कि ब्राह्मण बटें रहें? ब्राह्मणों पर चारो तरफ से विभिन्न प्रकार के हमले हो रहे है। इसलिए ब्राह्मणों को एक होना चाहिए और अपने स्वाभिमान व अधिकार की लड़ाई लड़नी चाहिए। ब्राह्मणों को आपस में एक दूसरे की टांग नही खीचनी चाहिए।
ब्राह्मण विधायकों के सहभोज बैठक के विरोध में भारतीय जनता पार्टी के बरहज के ब्राह्मण विधायक दीपक मिश्रा भी मुखर है और इनका कहना है कि मै विधायक बनने से पहले ब्राह्मण था, लेकिन विधायक बनने के बाद ब्राह्मण नही हूँ और जाति की राजनीति नही होनी चाहिए। क्या ये बतायेंगे कि विधायकी का चुनाव लड़ते समय ब्राह्मणों से अपने लिए ब्राह्मण होने के नाम पर वोट क्यों मांगते थे? मै मानता हूं कि इनको दुसरे जाति के लोगों ने भी वोट दिया है। लेकिन इनको समझना चाहिए कि इस जातिवादी राजनीतिक ब्यवस्था में ये हमेशा ब्राह्मण ही रहेगें। यदि ब्राह्मणों में किसी भी स्तर पर एकता हो रही है तो इनको पीड़ा क्यों हो रही है? यह क्यों ब्राह्मण एकता की टांग खींच रहे हैं?
भारतीय जनता पार्टी के सरकार के सहयोगी सुहेलदेव भारत समाज पार्टी के अध्यक्ष और प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर को ब्राह्मण विधायकों के सहभोज बैठक से पीड़ा हो रही है और जाति की राजनीति न करने का ज्ञान दे रहे हैं। जबकि इन्होने अपनी पार्टी अपने जाति की राजनीति करने के लिए ही बनाई है और प्रदेश सरकार में मंत्री पद की मलाई जाति की राजनीति के कारण ही खा रहे है। यदि इनको जाति की राजनीति पसंद नही है तो अपनी पार्टी का विलय ये भारतीय जनता पार्टी में क्यों नही कर देते है?
भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को भी ब्राह्मण विधायकों के सहभोज बैठक से पीड़ा हो रही है और जाति की राजनीति न करने की चेतावनी दे रहे है और आगे ऐसा न करने की धमकी दे रहे तथा ब्राह्मण विधायकों को कार्यवाही का डर दिखा रहे है। जबकि ये भी जानते हैं कि इनके प्रदेश अध्यक्ष बनने की योग्यता इनका कुर्मी जाति का होना है। जिससे उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में तथाकथित पिछड़ी जाति के कुर्मी और अन्य तथाकथित पिछड़ी जातियों को भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मजबूती से जोड़ा जा सके। क्योंकि उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के नाम पर कई राजनीतिक पार्टियां बनी है। सभी राजनीतिक पार्टियों का पुरा राजनीतिक समीकरण ही जातिवादी ब्यवस्था पर आधारित है और भारतीय जनता पार्टी को पिछड़ी जातियों के वोटों का विखरने का डर रहता है। 95% ब्राह्मण भारतीय जनता पार्टी को वोट देता और और शेष सवर्णो का अधिकतर वोट भी भारतीय जनता पार्टी को ही मिल रहा है।
मै भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी से पुछना चाहता हूं कि यदि आपको जाति की राजनीति पसंद नही है तो आपकी पार्टी में पिछड़ा मोर्चा क्यों? अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति मोर्चा क्यों? अल्पसंख्यक मोर्चा क्यों? और यदि ये उचित हैं तो सवर्ण मोर्चा क्यों नही?
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