चयूजीसी नियमावली में सामान्य/सवर्ण वर्ग न्याय से वंचित क्यों?
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यूजीसी नियमावली में सामान्य/सवर्ण वर्ग न्याय से वंचित क्यों?
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यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस-2026 के यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) नियमावली का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी/समता कमेटी बनाकर जाति आधारित भेदभाव को रोकना और समानता को बढ़ावा देना बताया जा रहा है, लेकिन ये नियमावली वास्तव में सामान्य/सवर्ण वर्ग के छात्रों, प्रोफेसरों/अध्यापकों और कर्मचारियों के लिए अन्यायपूर्ण और डर का माहौल पैदा करना वाला हैं।
यूजीसी के नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि शिकायत मिलते ही तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। इक्विटी कमिटी को 24 घंटे के अंदर बैठक करनी है। जांच 15 कार्य दिवसों में पूरी करनी है, और संस्थान प्रमुख को 7 दिनों में एक्शन शुरू करना है। अगर संस्थान इनका पालन नहीं करता है तो यूजीसी फंडिंग रोक सकती है। डिग्री प्रोग्राम्स बंद करवा सकती है, या मान्यता तक छीन सकती है। इससे यूनिवर्सिटी/कालेज पर भारी कम्प्लायंस प्रेशर पड़ता है। जांच से पहले ही कार्रवाई का डर और बिना पूरी जांच के प्रतिबंध लगाने का खतरा सबसे बड़ी समस्या है। इसके अनुसार प्रिज़म्पशन ऑफ गिल्ट यानी आरोपी को पहले से दोषी मान लिया जाता है। शिकायत जो कि अनाम या बिना सबूत वाली भी हो सकती है। शिकायत आते ही सामान्य वर्ग का व्यक्ति डिफॉल्ट रूप से दोषी ठहराया जाता है। सबूत बाद में जुटाए जाते हैं, और सजा पहले मिल जाती है। यह बिल्कुल उल्टा है। भारतीय न्याय व्यवस्था में हमेशा "निर्दोष साबित होने तक निर्दोष" का सिद्धांत रहा है, लेकिन यहां आरोपी को खुद साबित करना पड़ता है कि वह निर्दोष है। सबसे खतरनाक बात यह है कि झूठी शिकायत पर कोई सजा नहीं है। कोई प्रावधान नहीं कि अगर शिकायत झूठी, दुर्भावनापूर्ण या बदले की भावना से की गई तो शिकायतकर्ता पर कार्रवाई होगी। इससे व्यक्तिगत दुश्मनी, अकादमिक राजनीति या छोटी-मोटी बातों को जाति का रंग देकर शिकायत करने का रास्ता खुल जाता है। सामान्य वर्ग के लोग अब हर बात में डरेंगे। कक्षा में सवाल पूछना, मार्किंग करना, या सामान्य बातचीत भी गलत समझी जा सकती है। ये दिशानिर्देश संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।
यूजीसी नियमावली प्राकृतिक न्याय (नेचुरल जस्टिस) के विरूद्ध है। जिसमें "दूसरे पक्ष को सुनने का अधिकार" से वंचित किया जा रहा है।
यूजीसी नियमावली संविधान के अनुच्छेद 14 में वर्णित "कानून के समक्ष समानता के अधिकार" के विरूद्ध है। एक वर्ग को हमेशा पीड़ित और दूसरे को हमेशा अपराधी मानना न्याय का सिद्धांत नही है।
यूजीसी नियमावली संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित "जीवन और गरिमा का अधिकार" के विरूद्ध है। बिना ठोस सबूत के किसी के प्रतिष्ठा और करियर को बर्बाद करना न्याय नही है।
जिस देश में प्राकृतिक न्याय सर्वोपरि था, सबूत पहले जरूरी थे, वहां अब बिना सबूत के अपराधी घोषित करने की व्यवस्था लाई जा रही है। यह सुरक्षा के नाम पर एक वर्ग का उत्पीड़न है। शिक्षा को सुरक्षित बनाने के बजाय असुरक्षित बना दिया जा रहा है। सामान्य वर्ग के प्रोफेसर/अध्यापक, कर्मचारी और छात्र डर के साये में रहेंगे। खुली बहस, मेरिट और अकादमिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। सभी की असली सुरक्षा जरूरी है, लेकिन उसके लिए किसी दूसरे वर्ग को पीड़ित बनाना गलत है। सच्ची समानता में सभी तरफ संतुलन होना चाहिए। पीड़ित की सुरक्षा के साथ-साथ झूठी शिकायतों से बचाव भी होना चाहिए।
यूजीसी के न्याय विरोधी नियमावली को तुरन्त बदलना चाहिए। जिसमें इक्विटी कमेटी में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व, प्राकृतिक न्याय, सबूत-आधारित जांच, झूठी शिकायत पर सजा और सभी वर्गों के लिए समान न्याय का प्राविधान हो। तभी विश्वविद्यालय/कालेज उच्च शिक्षा, न्याय, मेरिट और समान अवसर का सच्चा केंद्र बनेगें।
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