अमेरिका का वेनेजुएला पर हमला और वहां के राष्टपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण करना दादागीरी और गुण्डागर्दी है_
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अमेरिका का वेनेजुएला पर हमला और वहां के राष्टपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण करना दादागीरी और गुण्डागर्दी है_
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अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई किया और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस का अपहरण करके अमेरिका में लाया है। यह अमेरिका द्वारा किसी देश की संप्रभुता पर सीधा हमला है। यह हमला अमेरिका की दादागीरी और गुण्डागर्दी है।
अमेरिका ने वेनेजुएला द्वारा ड्रग्स तश्करी करके अमेरिका में खतरनाक ड्रग्स भेजने का हवाला देते हुए यह सन्य कार्रवाई किया गया है। लेकिन असली खेल कच्चे तेल का है, बाकी सब बहाना है।
अमेरिकी ऊर्जा एजेंसी US Energy Information Administration के मुताबिक, वेनेजुएला के पास करीब 303 अरब बैरल कच्चे तेल का प्रमाणित भंडार है। यह दुनिया के कुल तेल भंडार का लगभग पांचवां हिस्सा माना जाता है। यानी पृथ्वी पर मौजूद किसी भी देश के मुकाबले वेनेजुएला के पास सबसे ज्यादा साबित तेल भंडार हैं।
अमेरिका कभी किसी का मित्र नही हो सकता है। अमेरिका अपनी सामरिक और आर्थिक प्रभुत्व के लिए किसी भी देश पर हमला कर देता है, किसी भी देश में शक्ति प्रयोग करके वहां सरकार बदल देता है, किसी भी देश में साजिश करके मौजूदा सरकार का तख्ता पलटवा देता है, देशों को एक दुसरे से लड़वा देता है, किसी भी देश में आरजकता, आतंकवाद और अस्थिरता पैदा कर देता है। दुनिया में जितने भी आतंकवादी संगठन है अधिकतर अमेरिका की देन है। अमेरिका यह सब करने के लिए फंडिंग भी करता है और हथियार भी सप्लाई करता है। दुनिया में जिस देश में भी अशांति है उन सबकी जड़ अमेरिका है। अमेरिका शांति का दुश्मन है।
मै वर्ष 1991 में अमेरिका पर एक कविता लिखा था, वह कविता आज के समय भी अमेरिका पर चरितार्थ हो रहा है।
आहत करते अर्थ भाव
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कह रहे हो शंखनाद है
यह क्रांति का,
बजा रहे हो बिगुल युद्ध का।
कर रहे हो उद्घोष शांति का,
दिखा रहे हो भय शक्ति का।
नंगा ताण्डव कर रहे हो,
बात सृजन की कर रहे हो।
स्वयं भू तुम बन रहे हो,
जीवन को ही रौद रहे हो।
छीन रहे हो सबका उल्लास,
बदल रहे हो शब्द विन्यास।
अर्थ का अनर्थ बनाकर
कर रहे हो विनाश,
कर रहे हो सृष्टि का उपहास।
कर रहे हो मनमाना परिवर्तन,
चीख रही है उत्पीड़न।
सन्नाटे में है पिड़ीत क्रन्दन,
जबरन करा रहे हो अभिनन्दन।
क्या तुमने सोचा कभी ?
आहत हो रही है
जन जन की अभिलाषा।
क्यो थोप रहे हो सबके उपर ?
तुम अपनी प्रत्याशा।
क्यो बना रहे हो तुम ?
अपने स्वार्थ की सारी परिभाषा।
क्या तुम बन सकते हो ?
ब्यथितो के खुशियों की आशा।
___राजेश मिश्रा_
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