शून्य क्या है?
शून्य की रिक्तता में ही पुर्णता है, और शून्य की महत्ता उसके रिक्तता में ही है। शून्य का रिक्तता शून्य का विस्तार है।
शून्य सनातन की खोज है। कहा जाता है कि शून्य की खोज आर्य भट्ट ने किया, जबकि आर्य भट्ट पांचवी सदी में पैदा हुए थे, और शून्य का प्रयोग वैदिक काल से ही हो रहा है। आदि काल का उन्नत काल वैदिक काल है। वेदों में वैदिक गणित प्रचलित है। गणितज्ञों ने वेदों से ही प्रेरणा लेकर शून्य को विकसित किया। आर्य भट्ट ने पांचवी सदी में शून्य को आधुनिक गणित में स्थापित किया तथा ब्रह्म गुप्त ने सातवीं सदी में शून्य को एक स्वतंत्र संख्या के रूप में परिभाषित किया और इसकी गणना विधियां बताई।
वेदों में ब्रह्म की अवधारणा के समानांतर ही शून्य की अवधारणा है। वेदों में और वेदांग ज्योतिष शास्त्र में शून्य को "खं" के रूप में परिभाषित किया गया है, जो आकाश, अंतरिक्ष और रिक्त स्थान है। वेद की एक घोषणा है, "ओम् खं ब्रह्मः"। जिसका अर्थ है कि ब्रह्म शून्य अर्थात निराकार, अनंत, असीमित है, और सभी का आधार है। निराकार का अर्थ है, "निर्गतो आकाराः यस्मात्"। अर्थात जिससे सभी आकार निकले हो। ब्रह्म अनेक रूपों में प्रकट होता। निराकार के संदर्भ मे कहा गया है, "आकारेभ्यो यः स निराकारः"। अर्थात सभी आकारो का जो अतिक्रमण करने की सामर्थ्य रखता हो अर्थात जिसका आकार अखिल ब्रह्मांड से भी बड़ा हो वह निराकार कहलाता है।
शून्य का आकार वृत्तीय है। इस सृष्टि में सब कुछ शून्य से आता है और वापस शून्य में चला जाता है। ये आधुनिक विज्ञान की भी व्याख्या है।
भारतीय सनातन विद्या अध्ययन में अंतरिक्ष का अध्ययन करने वाले शास्त्र को खगोल शास्त्र कहा गया है। खगोल दो शब्दों "ख" और "गोल" से मिल कर बना है। "ख" का अर्थ आकाश या अंतरिक्ष और "गोल" का अर्थ शून्य का आकार है। सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण में जब सूर्य या चंद्रमा पूरी तरह अदृश्य हो जाता है तब उस स्थिति को खग्रास अर्थात पूर्ण ग्रहण कहा जाता है। खग्रास का अर्थ हुआ सूर्य या चंद्रमा शून्य का ग्रास अर्थात निवाला बन गया। पंक्षी आकाश में गमन करता है, इसलिए पंक्षी को खग कहा जाता है। यहां "ख" का तात्पर्य "आकाश" और "ग" का तात्पर्य गमन करने वाला अर्थात जाने वाला या चलने वाला है।
वैदिक ऋषियों ने दशमलव पद्धति और स्थानीय मान पद्धति का आविष्कार कर संपूर्ण विश्व को गणना का बुनियादी ढांचा दिया। 0(शून्य) से 9 तक के अंको से सभी संख्याएँ बनती हैं। 0(शून्य) से 9 तक के अंको में सबसे महिमावान शून्य है। शून्य का महत्व शून्य किस स्थान पर है इससे मालूम चलता है। शून्य जिस स्थान पर होता है वहां रहकर अपना स्थानीय मान बताता है।
सनातन शास्त्रों में शून्य को धनात्मक और ऋणात्मक शक्तियों के मध्य एक अदृश्य शक्ति माना गया है। शून्य की शक्ति ब्रह्म की भाँति अदृश्य है। शून्य किसी भी संख्या का स्वरूप बदल देता है, और किसी भी संख्या को नया आकार प्रदान कर देता है।
___राजेश मिश्रा_
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